चाल वक़्त की

रुकता नही कही पे
मुड़ता नही ये पीछे
क्यूँ नहीं सवरती ये चाल वक़्त की
             #
देखूँ जो कभी मुड़ के
पछतावे के सिवा मुझको
कोई राह नही दिखती
            #
रह जाती हूँ पीछे-पीछे
क्या करु वक़्त से मेरी
चाल नही मिलती
         

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